प्रशासन के आगे जनता के आंसू मिट्टी मोल
गंजबासौदा-क्षेत्र के चुनिंदा ग्रामीण अंचलों में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार समाज की हालत सालों बाद भी सुधरने का नाम नहीं ले रही है। केन्द्र तथा राज्य सरकार की तमाम सारी योजनाएं भी इनके जीवन में कोई नया बदलाव लेकर नहीं आई है। आज भी इस समाज की हालत अत्यन्त दयनीय तथा चिंतनीय है। इनके बच्चे आज भी उच्च शिक्षा को तरस रहे हैं।
जबकि अब परेशानियां पहले से और भी बढ़ गई है। कुम्हार बताते हैं कि बर्तन बनाने के लिए मिट्टी तक नहीं मिल पा रही है। वर्तमान में जब गर्मी का मौसम होता है तो कुम्हारों की याद आना स्वभाविक है। चुकिं मिट्टी के मटके (देशी फ्रीज) इन कुम्हारों के द्वारा ही बनाए जाते हैं। तालाबंदी (लॉकडाउन) के बीच यह लोग दोपहर की तपती धूप में भी काम करते हुए मिले। इसके अलावा उन्होंने जो अपनी व्यथा बताई, वह काफी दयनीय और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करने वाली है। तभी तो मिट्टी के बर्तन बनाने वाले इन कुम्हार परिवारों को पेट पालने के लिए लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं।
वहीं प्रशासन सरकार इनके परिवारों को सुविधा ,शिक्षा, रोजगार,स्वास्थ्य तो नहीं दे पा रही और इनके पारिवारिक धंधे को भी तालाबंदी के दौर मे बंद करवाने उतर आयी।
शहर में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ सड़क किनारे मटके बेच रहे बच्चों पर कोरोना गाइडलाइन का उल्लंघन का हवाला देते हुए कार्रवाई कर दी और बच्चों के दर्जनों मटके नगर पालिका की गाड़ी बुला कर जप्त कर लिए | बच्चों ने प्रशासन के आला अधिकारियों से हाथ जोड़कर निवेदन किया लेकिन साहब दुकान यहां लगाने पर बच्चों पर बरसते रहे, रोते बिलखते बच्चों ने कहा हम किसी प्रकार की भीड़ लगाकर मटके नहीं बेच रहे थे फिर भी प्रशासन ने हमारे मटके जप्त कर लिए।
यह लाकडाऊन का उल्लंघन है लेकिन गरीब बच्चों की माने तो उनकी यह बेचना मजबूरी थी पूरे साल धंधे चौपट रहे गर्मी के सीजन में थोड़ी बहुत खरीददारी होती थी इसलिए इस बच्चे ने ब्याज से पैसे लेकर मटके बनवाए और जय स्तंभ चौक पर मटके बेचने आ गये , लेकिन साहब को बच्चे पर तरस नहीं आया और पुलिस और नगर पालिका के साथ साहब ने गरीब बच्चों के मटके नगर पालिका की लोडिंग गाड़ी बुला कर भरवा दिए |
जिस प्रकार लाकडाऊन मे भी कुछ आवश्यक जरूरत के व्यापार जैसे पैट्रोल पंप ,भोजन पार्सल,सब्जी, फल ऐसे कई तरह के व्यवसाय खोलना पड रहा है वहीं ठंडे पानी के मटके भी जनता की आवश्यक जरूरत है और गरीब का रोजगार। वैसे भी लाकडाऊन मे बडी संख्या मे लोग बेरोजगार हुये है।
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